हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर साल में 24 एकादशियां आती है। इन सभी के बीच भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का विशेष महत्व बताया जाता है। इस एकादशी को जलझूलनी एकादशी या परिवर्तिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है की श्री कृष्ण-जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले जातकों को विशेष रूप से यह व्रत रखना चाहिए। यह व्रत मान-प्रतिष्ठा, धन और सुख-समृद्धि में वृद्धि करता है।
तो आइए जानते है जलझूलनी एकादशी का व्रत (Jal Jhulni Ekadashi Vrat) कब रखा जाएगा। जलझूलनी एकादशी व्रत अनुष्ठान, पूजा विधि और इस दिन दान करने योग्य फलदायी वस्तुएं।
श्रावण के बाद भाद्रपद माह में आने वाली शुक्ल एकादशी को जलझूलनी एकादशी या परिवर्तिनी एकादशी (Parivartani ekadashi) कहा जाता हैं।
परिवर्तिनी एकादशी के साथ ही इसे अन्य कई नामों से भी जाना जाता है। जैसे- डोल ग्यारस (Dol Gyaras),जयंती एकादशी (Jayanti Ekadashi), वामन एकादशी (Vaman Ekadashi) और पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi)।
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की भव्य झांकी सजाई जाती है। फिर उन्हें पालकी या झूले पर विराजमान किया जाता है और नगर में शोभायात्रा निकाली जाती है। भक्त इस सुंदर पालकी के दर्शन करते है और भगवान से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते है।
2025 की बात करें तो इस साल जलझूलनी एकादशी (Jal Jhulni Ekadashi) का यह व्रत बुधवार, 3 सितम्बर, 2025 के दिन रखा जाएगा। इस तिथि का शुरुआत व समापन समय इस प्रकार है-
एकादशी तिथि प्रारंभ समय - 3 सितंबर, सुबह 03:53 बजे से
एकादशी तिथि समापन समय - 4 सितंबर, सुबह 04:21 बजे तक
दोपहर 11:29 बजे से 12:18 बजे तक
4 सितंबर 2025 - दोपहर 01:36 बजे से शाम 04:07 बजे तक
• माना जाता है कि इस दिन माता यशोदा ने श्रीकृष्ण का जलवा पूजन किया था। इसी दिन से डोल ग्यारस (Dol Gyaras) का पर्व शुरू हुआ।
• जल झूलनी एकादशी का त्यौहार बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है।
• इसके बाद, भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की मूर्तियों को पवित्र जल में विसर्जित किया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान होता है। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा जीवन में बनी रहती है।
• जल झूलनी एकादशी (Jal Jhulni Ekadashi) के दिन एक विशेष पालकी उत्सव होता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। उन्हें सजाकर पालकी में विराजमान किया जाता है। देशभर में यह शोभायात्रा भजन-कीर्तन और उत्साह के साथ निकाली जाती है।
1. जलझूलनी ग्यारस (एकादशी) व्रत का धार्मिक महत्व इस प्रकार है-
2. यह व्रत रखने से व्यक्ति को वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य और फल प्राप्त होते हैं।
3. जलझूलनी एकादशी का व्रत खास तौर पर रोग-दोष से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है।
4. यह एकादशी धन-धान्य और प्रतिष्ठा में वृद्धि लाने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।
5. जलझूलनी ग्यारस का व्रत और दान-पुण्य करने से व्यक्ति के सौभाग्य में वृद्धि होती है।
6. आध्यात्मिक दृष्टि से, यह एकादशी जीवन के सभी कष्ट और संकट दूर करने वाली मानी जाती है।
जलझूलनी एकादशी (JalJhulni Ekadashi) पर दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। खासतौर पर इन वस्तुओं का दान अवश्य करना चाहिए-
•अनाज और सूखे मेवे दान करें।
• बुजुर्गों और लाचारों की सेवा करें।
• जरूरतमंदों को साफ़-सुथरे कपड़े दान करें।
• वेद-पाठी ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।
• मंदिरों, अनाथालयों या जरूरतमंदों को धन या भोजन दान करें।
जलझुलनी एकादशी (Jal Jhulni Ekadashi 2025) को लेकर एक मान्यता यह भी बताई जाती है कि इस दिन भगवान विष्णु निद्रा में करवट बदलते हैं। यही कारण है की इस दिन भगवान नारायण के वामन अवतार की भी विशेष पूजा की जाती है।